0:03 पतंजलि योग दर्शन समाधि
0:07 पाद
0:09 प्रथम अथ
0:12 योगासनम अब परंपरागत योग विषयक शास्त्र
0:17 आरंभ करते
0:19 हैं
0:21 व्याख्या इस सूत्र में महर्षि पतंजली ने
0:25 योग के साथ अनुशासन पद प्रयोग करके योग
0:30 शिक्षा की अनादि सूचित की है और अथ शब्द
0:34 से उसके आरंभ करने की प्रतिज्ञा करके योग
0:39 साधना की कर्तव्य सूचित की
0:43 है
0:45 संबंध इस प्रकार के योगशास्त्र के वर्णन
0:48 की प्रतिज्ञा करके अब योग के सामान्य
0:52 लक्षण बतलाते
0:56 हैं योग चित वृत्ति निरोध
1:01 चित्त की वृत्तियों का
1:03 निरोध यानी सर्वथा रुक जाना योग
1:08 है इस ग्रंथ में प्रधानता से चित्त की
1:12 वृत्तियों के निरोध को ही योग नाम से कहा
1:16 गया
1:18 है योग शब्द की परिभाषा करके अब उसका
1:23 सर्वोपरि फल बतलाते
1:26 हैं तदा दृष्ट सर्व रूपे
1:30 [संगीत]
1:32 स्थानम जब चित्त की वृत्तियों का निरोध हो
1:35 जाता
1:36 है उस समय दृष्टा आत्मा की अपने स्वरूप
1:42 में स्थिति हो जाती
1:44 है अर्थात वह कैवल्य अवस्था को प्राप्त हो
1:48 जाता
1:51 है
1:53 संबंध क्या चित्त वृत्तियों का निरोध होने
1:56 के पहले दृष्टा अपने स्वरूप में स्थित
2:01 नहीं
2:02 रहता इस पर कहते
2:05 हैं वृत्ति सारू प्यम
2:09 मित जब तक योग साधनों के द्वारा चित्त की
2:14 वृत्तियों का निरोध नहीं हो जाता तब तक
2:17 दृष्टा अपने चित्त की वृत्ति के ही अनुरूप
2:21 अपना स्वरूप समझता रहता
2:24 है उसे अपने वास्तविक स्वरूप का ज्ञान
2:27 नहीं
2:28 होता
2:30 अतः चित्त वृत्ति निरोध रूप योग अवश्य
2:35 कर्तव्य
2:37 है
2:39 संबंध चित्त की वृत्तियां असंख्य होती हैं
2:43 अतः उनको पांच श्रेणियों में बांटकर सूत्र
2:47 का उनका स्वरूप बतलाते
2:51 हैं वृत पंच तय क्लिष्ट
2:58 क्लिष्ट उपर्युक्त
3:00 क्लिष्ट और अक्लिश भेदों वाली वृत्तियां
3:03 पांच प्रकार की होती
3:07 हैं यह चित्त की वृत्तियां आगे वर्णन किए
3:10 जाने वाले लक्षणों के अनुसार पांच प्रकार
3:13 की होती हैं तथा हर प्रकार की वृत्ति के
3:17 दो भेद होते
3:20 हैं एक तो
3:23 क्लिष्ट यानी अविद्या आदि क्लेश को पुष्ट
3:27 करने वाली और योग साधन में विघ्न रूप होती
3:32 है और दूसरी अ क्लिष्ट यानी क्लेश को क्षय
3:38 करने
3:40 वाली और योग साधन में सहायक होती
3:45 है साधक को चाहिए कि इस रहस्य को भली भाति
3:50 समझकर
3:51 पहले अक्लिश वृत्तियों से क्लिष्ट
3:55 वृत्तियों को
3:58 हटाए फिर उन अक्लिश वृत्तियों का भी निरोध
4:02 करके योग सिद्ध
4:06 करें संबंध उक्त पांच प्रकार की वृत्तियों
4:10 के लक्षणों का वर्णन करने के लिए पहले
4:14 उनके नाम बतलाते
4:17 हैं प्रमाण विपर्यय विकल्प निद्रा
4:23 स्मृत पहला
4:27 प्रमाण दूसरा विपर
4:31 तीसरा
4:34 विकल्प चौथा
4:36 निद्रा पांचवा
4:40 स्मृति इन पांचों के स्वरूप का वर्णन
4:43 स्वयं सूत्र का ने अगले सूत्रों में किया
4:46 है अतः यहां उनकी व्याख्या नहीं की गई
4:51 है उपर्युक्त पांच प्रकार की वृत्तियों
4:54 में से प्रमाण वृत्ति के भेद बतलाए जाते
4:58 हैं प्रत्यक्षा अनुमाना गम
5:04 प्रमाणात
5:06 अनुमान और
5:09 आगम यह तीन प्रमाण
5:12 है प्रमाण वृत्ति तीन प्रकार की होती है
5:17 उसको इस प्रकार समझना
5:20 चाहिए पहला प्रत्यक्ष
5:24 प्रमाण बुद्धि मन और इंद्रियों के जानने
5:28 में आने वाले
5:30 जितने भी पदार्थ
5:31 हैं उनका अंतःकरण और इंद्रियों के
5:36 साथ बिना किसी व्यवधान के संबंध होने
5:40 से जो भ्रांति तथा संशय रहित ज्ञान होता
5:45 है प्रत्यक्ष अनुभव से होने वाली प्रमाण
5:49 वृत्ति
5:51 है जिन प्रत्यक्ष दर्शनों से संसार के
5:55 पदार्थों की क्षण भंगुरता का निश्चय होकर
6:00 या सब प्रकार से उनमें दुख की प्रतीति
6:05 होकर मनुष्य का सांसारिक पदार्थों में
6:08 वैराग्य हो जाता
6:10 है जो चित्त की वृत्तियों को रोकने में
6:13 सहायक
6:15 हैं जिनसे मनुष्य की योग साधन में श्रद्धा
6:20 और उत्साह बढ़ते
6:22 हैं उनसे होने वाली प्रमाण वृत्ति तो अ
6:26 क्लिष्ट
6:28 है तथा
6:30 जिन प्रत्यक्ष दर्शनों से मनुष्य को
6:33 सांसारिक
6:34 पदार्थ नित्य और सुख रूप होते
6:38 हैं भोगों में आसक्ति हो जाती है जो
6:42 वैराग्य के विरोधी भावों को बढ़ाने वाले
6:46 हैं उनसे होने वाली प्रमाण वृत्ति क्लिष्ट
6:52 है दूसरा अनुमान
6:57 प्रमाण किसी प्र प्रत्यक्ष दर्शन के
7:01 सहारे युक्तियों द्वारा जो अप्रत्यक्ष
7:03 पदार्थ के स्वरूप का ज्ञान होता
7:08 है वह अनुमान से होने वाली प्रमाण वृत्ति
7:12 है जैसे धूम को देखकर अग्नि की विद्यमान
7:16 का ज्ञान
7:18 होना नदी में बाढ़ आई देखकर दूर देश में
7:23 बारिश होने का ज्ञान होना
7:27 इत्यादि इतने में भी जिन अनुमानों से
7:31 मनुष्य को संसार के पदार्थों की
7:34 अनित्य दुख रूपता आदि दोषों का ज्ञान होकर
7:39 उनमें वैराग्य होता
7:41 है और योग के साधनों में श्रद्धा बढ़ती
7:46 है जो आत्म ज्ञान में सहायक
7:49 हैं वे सब वृत्तियां तो अ क्लिष्ट
7:54 हैं और उनके विपरीत वृत्तियां क्लिष्ट हैं
8:02 तीसरा आगम
8:05 प्रमाण वेद शास्त्र और
8:10 आप्त यानी यथार्थ वक्ता पुरुषों के वचन को
8:15 आगम कहते
8:17 हैं जो पदार्थ मनुष्य के अंतःकरण और
8:21 इंद्रियों के प्रत्यक्ष नहीं है एवं जहां
8:25 अनुमान की भी पहुंच नहीं
8:27 है उसके रूप का
8:30 ज्ञान वेद शास्त्र और महापुरुषों के वचनों
8:34 से होता
8:35 है वह आगम से होने वाली प्रमाण वृत्ति
8:42 है जिस आगम प्रमाण से मनुष्य का भोगों में
8:45 वैराग्य होता है और योग साधनों में
8:49 श्रद्धा उत्साह बढ़ते
8:51 हैं वह तो अक्लिश
8:55 है और जिस आगम प्रमाण से भोगों में
8:59 प्रवृत्ति और योग साधनों में अरुचि
9:03 हो जैसे स्वर्ग लोक के भोगों की बढाई
9:07 सुनकर उनमें और उनके साधन रूप सकाम कर्मों
9:11 में आसक्ति और प्रवृत्ति होती
9:14 है वह क्लिष्ट
9:18 है प्रमाण वृत्ति के भेद बतला करर अब
9:22 विपर्यय वृत्ति के लक्षण बतलाते
9:26 हैं विपर्यय मिथ्या ज्ञानम त दूप
9:35 प्रतिष्ठित नहीं है ऐसा मिथ्या ज्ञान
9:40 विपर्यय
9:43 है
9:45 व्याख्या किसी भी वस्तु के असली स्वरूप को
9:49 ना समझकर
9:50 उसे दूसरी ही वस्तु समझ
9:53 लेना यह विपरीत ज्ञान ही विपर्यय वृत्ति
9:58 है
10:01 जैसे सीप में चांदी की
10:05 प्रतीति यह वृत्ति भी यदि भोगों में
10:09 वैराग्य उत्पन्न करने
10:12 वाली और योग मार्ग में श्रद्धा उत्साह
10:15 बढ़ाने वाली हो तो अक्लिश है अन्यथा
10:20 क्लिष्ट
10:22 है जिन इंद्रिय आदि के द्वारा वस्तुओं का
10:26 यथार्थ ज्ञान होता है उन्हीं से विपरीत
10:29 ज्ञान भी होता
10:32 है यह मिथ्या ज्ञान भी कभी-कभी भोगों में
10:36 वैराग्य करने वाला हो जाता
10:40 है जैसे भोग्य पदार्थ की क्षण भंगुरता को
10:44 देखकर अनुमान करके या सुनकर उनको सर्वथा
10:48 मिथ्या मान
10:50 लेना योग सिद्धांत के अनुसार विपरीत
10:54 वृत्ति
10:56 है क्योंकि वे परिवर्तन शील होने पर भी
11:00 मिथ्या नहीं
11:02 है तथापि यह मान्यता भोगी में वैराग्य
11:07 उत्पन्न करने वाली होने से अक्
11:12 है कुछ महानुभव के मतानुसार विपर्यय
11:17 वृत्ति और
11:19 अविद्या दोनों एक ही
11:23 हैं परंतु यह युक्ति संगत नहीं मालूम
11:27 होता क्योंकि अविद्या का नाश तो केवल
11:32 अंप्र ज्ञात योग से ही होता है जहां
11:36 प्रमाण वृत्ति भी नहीं
11:40 रहती किंतु विपर्यय वृत्ति का नाश तो
11:43 प्रमाण वृत्ति से ही हो जाता
11:47 है इसके सिवा योगशास्त्र के मतानुसार
11:51 विपर्यय ज्ञान चित्त की वृत्ति
11:55 है किंतु अविद्या चित्त वृति नहीं मानी गई
12:01 है क्योंकि वह दृष्टा और दृश्य के स्वरूप
12:06 की उपलब्धि में हेतु भूत संयोग का भी कारण
12:12 है तथा अस्मिता और राग आदि क्लेश का भी
12:17 कारण
12:19 है इसके अतिरिक्त प्रमाण वृत्ति में
12:23 विपर्यय वृत्ति नहीं
12:27 है परंतु द्वेष आदि क्लेश का वहां भी
12:30 सद्भाव
12:32 है इसलिए भी विपर्यय वृत्ति और अविद्या की
12:37 एकता नहीं हो
12:39 सकती क्योंकि विपर्यय वृत्ति तो कभी होती
12:42 है और कभी नहीं
12:46 होती किंतु अविद्या तो कैवल्य अवस्था की
12:50 प्राप्ति तक निरंतर विद्यमान रहती
12:56 है उसका नाश होने पर तो सभी वृत्तियों का
13:02 धर्मी स्वयं चित्त भी अपने कारण में विलीन
13:07 हो जाता
13:11 है परंतु प्रमाण वृत्ति के समय विपर्यय
13:15 वृत्ति का अभाव हो जाने पर
13:18 भी ना तो राग द्वेष का नाश होता
13:22 है तथा ना दृष्टा और दृश्य के संयोग का
13:27 ही इसके सिवा प्रमाण वृत्ति क्लिष्ट भी
13:31 होती
13:33 है परंतु जिस यथार्थ ज्ञान से अविद्या का
13:37 नाश होता है वह क्लिष्ट नहीं
13:42 होती अतः यही मानना ठीक है कि चित्त का
13:47 धर्म रूप विपर्यय वृत्ति अन्य पदार्थ
13:51 है तथा पुरुष और प्रकृति के संयोग की कारण
13:55 रूपा अविद्या उससे सर्वथा भिन्न
14:01 है
14:04 संबंध अब विकल्प वृत्ति के लक्षण बतलाए
14:07 जाते
14:09 हैं शब्द ज्ञाना अपा वस्तु शून्य
14:13 [संगीत]
14:16 विकल्प जो ज्ञान शब्द जनित ज्ञान के
14:20 साथ-साथ होने वाला
14:23 है और जिसका विषय वास्तव में नहीं है वह
14:27 विकल्प है
14:31 व्याख्या केवल शब्द के आधार पर बिना हुए
14:36 पदार्थ की कल्पना करने वाली जो चित्त की
14:39 वृत्ति है वह विकल्प वृत्ति
14:44 है यह भी यदि वैराग्य की वृद्धि में
14:48 हेतु योग साधनों में श्रद्धा और उत्साह
14:52 बढ़ाने वाली तथा आत्म ज्ञान में सहायक
14:56 हो तो अक् है
15:00 अन्यथा क्लिष्ट
15:04 है आगम प्रमाण जनित वृत्ति से होने वाले
15:09 विशुद्ध संकल्पों के सिवा सुनी सुनाई
15:12 बातों के आधार पर
15:14 मनुष्य जो अनेक प्रकार के व्यर्थ संकल्प
15:18 करता रहता
15:20 है उन सबको विकल्प वृत्ति के ही अंतर्गत
15:24 समझना
15:27 चाहिए विपर्यय वृत्ति में तो विद्यमान
15:31 वस्तु के स्वरूप का विपरीत ज्ञान होता
15:35 है और विकल्प वृत्ति में अ विद्यमान वस्तु
15:40 की शब्द ज्ञान के आधार पर कल्पना होती
15:45 है यही विपर्यय और विकल्प का भेद
15:51 है जैसे कोई मनुष्य सुनी सुनाई बातों के
15:55 आधार पर अपनी मान्यता के अनुसार भगवान के
15:59 रूप की कल्पना करके भगवान का ध्यान करता
16:04 है पर जिस स्वरूप का वह ध्यान करता है उसे
16:09 ना तो उसने देखा
16:11 है ना वेद शास्त्र सम्मत
16:15 है और ना वैसा कोई भगवान का स्वरूप वास्तव
16:19 में है
16:20 ही केवल कल्पना मात्र ही
16:25 है यह विकल्प वृत्ति मनुष्य को भगवान के
16:29 चिंतन में लगाने वाली होने से अक्लिश
16:36 है दूसरी जो भोगों में प्रवृत करने वाली
16:40 विकल्प वृत्तियां हैं वे क्लिष्ट
16:45 हैं इसी प्रकार सभी वृत्तियों में क्लिष्ट
16:49 और अक् का भेद समझ लेना
16:53 चाहिए अब निद्रा वृत्ति के लक्षण बतलाए
16:57 जाते हैं
17:00 अभाव
17:02 प्रत्यावर्ती
17:05 निद्रा अभाव के ज्ञान का
17:08 अवलंबन यानी ग्रहण करने वाली वृत्ति
17:12 निद्रा
17:14 है जिस समय मनुष्य को किसी भी विषय का
17:18 ज्ञान नहीं
17:19 रहता केवल मात्र ज्ञान के अभाव की ही
17:22 प्रतीति रहती
17:25 है वह ज्ञान के अभाव का ज्ञान जिस चित्त
17:29 वृत्ति के आश्रित रहता है वह निद्रा
17:33 वृत्ति
17:35 है निद्रा भी चित्त की वृत्ति विशेष
17:40 है तभी तो मनुष्य गाढ़ निद्रा से उठकर
17:44 कहता है कि मुझे आज ऐसी गाढ़ निद्रा
17:47 आई जिसमें किसी बात की कोई खबर नहीं
17:52 [संगीत]
17:53 रही इस स्मृति वृत्ति से ही यह सिद्ध होता
17:57 है कि निद्रा भी एक वृत्ति
18:02 है नहीं तो जगने पर उसकी स्मृति कैसे
18:09 होती निद्रा भी क्लिष्ट और अक्लिश दो
18:13 प्रकार की होती
18:16 है जिस निद्रा से जगने पर साधक के मन और
18:22 इंद्रियों में सात्विक भाव भर जाता
18:25 है आलस्य का नामो निशान नहीं रह
18:30 तथा जो योग साधन में उपयोगी और आवश्यक
18:34 मानी गई है वह अ क्लिष्ट
18:39 है दूसरे प्रकार की निद्रा उस अवस्था में
18:43 परिश्रम के आभाव का बोध
18:46 कराकर विश्राम जनित सुख में आसक्ति
18:50 उत्पन्न करने वाली होने से क्लिष्ट
18:55 है अब स्मृति वृत्ति के लक्षण बतलाए जाते
19:00 हैं अनुभूत विषयात प्रमो श
19:06 स्मृति अनुभव किए हुए विषय का ना
19:10 छिपना अर्थात प्रकट हो जाना स्मृति
19:15 है उपर्युक्त
19:18 प्रमाण विपर्यय
19:21 विकल्प और
19:24 निद्रा इन चार प्रकार की वृत्तियों द्वारा
19:27 अनुभव में आए हुए विषयों के जो संस्कार
19:31 चित्त में पड़े
19:32 हैं उनका पुनः किसी निमित्त को पाकर
19:36 स्फुरद हो जाना ही स्मृति
19:41 है उपर्युक्त चार प्रकार की वृत्तियों के
19:44 सिवा इस स्मृति वृत्ति से जो संस्कार
19:48 चित्त पर पड़ते
19:49 हैं उनमें भी पुनः स्मृति वृत्ति उत्पन्न
19:54 होती
19:56 है स्मृति वृत्ति भी क्लिष्ट और अक्लिश
20:01 दोनों ही प्रकार की होती
20:04 है जिस स्मरण से मनुष्य का भोगों में
20:08 वैराग्य होता
20:09 है तथा जो योग साधनों में श्रद्धा और
20:13 उत्साह बढ़ाने वाला एवं आत्म ज्ञान में
20:17 सहायक
20:18 है वह तो अक्
20:21 है और जिससे भोगों में राग द्वेष बढ़ता है
20:26 वह क्लिष्ट है
20:29 स्वप्न को कोईकोई स्मृति वृत्ति मानते
20:33 हैं परंतु स्वप्न में जागृत की भांति सभी
20:37 वृत्तियों का आविर्भाव देखा जाता
20:41 है अतः उसका किसी एक वृत्ति में अंत भाव
20:45 मानना उचित प्रतीत नहीं
20:48 [संगीत]
20:50 होता
20:53 संबंध यहां तक योग की
20:56 कर्तव्य योग के लक्ष
20:59 और चित्त वृत्तियों के लक्षण बतलाए
21:02 गए अब उन चित्त वृत्तियों के निरोध का
21:06 उपाय बतलाते
21:09 हैं अभ्यास वैराग्य ब्याम तन
21:15 निरोध उन चित्त वृत्तियों का
21:19 निरोध अभ्यास और वैराग्य से होता
21:23 है चित्त की वृत्तियों का सर्वथा निरोध
21:27 करने के लिए
21:28 अभ्यास और
21:30 वैराग्य यह दो उपाय
21:34 हैं चित्त वृत्तियों का प्रवाह परंपरागत
21:37 संस्कारों के बल
21:39 से सांसारिक भोगों की ओर चल रहा
21:44 है उस प्रवाह को रोकने का उपाय वैराग्य है
21:49 और उसे कल्याण मार्ग में ले जाने का उपाय
21:52 अभ्यास
21:57 है उक्त दोनों उपायों में से पहले अभ्यास
22:01 का लक्षण बतलाते
22:05 हैं तत्र स्थित यत्न
22:10 ब्यास उन दोनों में से चित्त की स्थिरता
22:14 के लिए जो प्रयत्न करता
22:16 है वह अभ्यास
22:20 है जो स्वभाव से ही चंचल है ऐसे मन को
22:26 किसी एक धय में स्थिर करने के लिए बारंबार
22:30 चेष्टा करते रहने का नाम अभ्यास
22:36 है इसके प्रकार शास्त्रों में बहुत बतलाए
22:39 गए
22:43 हैं इसी पाद के 32 में सूत्र से 39 व तक
22:49 अभ्यास के कुछ भेदों का वर्णन
22:53 है उनमें से जिस साधक के लिए जो सुगम हो
22:58 जिसमें उसकी स्वाभाविक रुचि और श्रद्धा हो
23:01 उसके लिए वही ठीक
23:04 है अब अभ्यास के दृढ़ होने का प्रकार
23:07 बतलाते
23:10 हैं सत दीर्घ काला निरंतर सत्कार सेवित
23:15 दृढ़
23:18 भूमि परंतु वह अभ्यास बहुत काल तक
23:23 निरंतर लगातार और आदर पूर्वक सांगोपांग
23:28 सेवन किया जाने पर दृढ़ अवस्था वाला होता
23:34 है
23:36 व्याख्या अपने साधन के अभ्यास को दृढ़
23:39 बनाने के लिए साधक को चाहिए कि साधन में
23:44 कभी उकता है
23:47 नहीं यह दृढ़ विश्वास रखें कि किया हुआ
23:51 अभ्यास कभी भी व्यर्थ नहीं हो
23:55 सकता अभ्यास के बल से मनुष्य निसंदेह
24:00 अपने लक्ष्य की प्राप्ति कर लेता
24:05 है यह समझकर अभ्यास के लिए काल की अवधि ना
24:10 रखे आजीवन अभ्यास करता
24:14 रहे साथ ही यह भी ध्यान
24:17 रखें कि अभ्यास में व्यवधान अंतर ना पढ़ने
24:23 पाए लगातार अभ्यास चलता
24:26 रहे और अभ्यास में तुच्छ बुद्धि ना करें
24:31 उसकी अवहेलना ना
24:33 करें बल्कि अभ्यास को ही अपने जीवन का
24:37 आधार बनाकर अत्यंत आदर और प्रेम पूर्वक
24:41 उसे सांगोपांग करता
24:43 रहे इस प्रकार किया हुआ अभ्यास दृढ़ होता
24:48 है अब अभ्यास के लक्षण आरंभ करते
24:52 हुए पहले अपर वैराग्य के लक्षण बतलाते हैं
24:59 दृष्टा श्र विक विषय वि तृष्ण स्य वशी का
25:03 संजा
25:07 वैराग्यं देखे और सुने हुए विषयों में
25:10 सर्वथा तृष्णा रहित चित्त की जो वकार नामक
25:15 अवस्था है वह वैराग्य
25:19 है अंतःकरण और इंद्रियों के द्वारा
25:22 प्रत्यक्ष अनुभव में आने वाले इस लोक के
25:26 समस्त भोगों का समाहार
25:29 यहां दृष्ट शब्द में किया गया
25:33 है और जो प्रत्यक्ष उपलब्ध नहीं है जिनकी
25:37 बड़ाई वेद शास्त्र और भोगों का अनुभव करने
25:41 वाले पुरुषों से सुनी गई है ऐसे भोग्य
25:45 विषयों का समाहार आनु श्र विक शब्द में
25:49 किया गया
25:51 है उपर्युक्त दोनों प्रकार के भोगों से जब
25:56 चित्त भली भात तृष्णा रहित हो जाता
26:00 है जब उसको प्राप्त करने की इच्छा का
26:04 सर्वथा नाश हो जाता
26:06 है ऐसे कामना रहित चित्त की जो वशी का
26:12 नामक अवस्था विशेष है वह अपर वैराग्य
26:19 है अब पर वैराग्य के लक्षण बतलाते
26:23 हैं तत् परम पुरुष खते गुण तृष्ण
26:29 पुरुष के ज्ञान से जो प्रकृति के गुणों
26:32 में तृष्णा का सर्वथा अभाव हो जाना है वह
26:37 पर वैराग्य
26:40 है पहले बतलाए हुए चित्त की वशी का संज्ञा
26:45 रूप वैराग्य
26:46 से जब साधक की विषय कामना का अभाव हो जाता
26:52 है और उसके चित्त का प्रवाह समान भाव से
26:58 अपने धय के अनुभव में एकाग्र हो जाता
27:01 है उसके बाद समाधि परिपक्व होने पर
27:06 प्रकृति और पुरुष विषयक विवेक ज्ञान प्रकट
27:09 होता
27:10 है उसके होने से जब साधक की तीनों गुणों
27:15 में और उनके कार्य में किसी प्रकार की
27:19 किंचन मात्र भी तृष्णा नहीं
27:23 रहती जब वह सर्वथा आप्त काम निष्काम हो
27:27 जाती
27:29 है ऐसी सर्वथा राग रहित अवस्था को पर
27:34 वैराग्य कहते
27:37 हैं इस प्रकार चित्त वृत्ति निरोध के
27:40 उपायों का वर्णन
27:42 करके अब चित्त वृत्ति निरोध रूप निर्ब योग
27:48 का स्वरूप बतला के लिए पहले उसके पूर्व की
27:52 अवस्था
27:53 का संप्र ज्ञात योग के नाम से
27:58 अवांतर भेदों के सहित वर्णन करते
28:03 हैं वितर्क विचारा आनंदा स्मिता अनुग मात
28:07 संप्र
28:10 ज्ञात वितर्क विचार आनंद और
28:16 अस्मिता इन चारों के संबंध से युक्त चित्त
28:20 वृत्ति का समाधान संप्र ज्ञात योग
28:26 है
28:28 व्याख्या संप्र ज्ञात योग के धय पदार्थ
28:32 तीन माने गए
28:35 हैं पहला ग्रहा इंद्रियों के स्थूल और
28:39 सूक्ष्म
28:41 विषय दूसरा ग्रहण इंद्रिया और
28:47 अंतःकरण तथा तीसरा
28:51 ग्रहीता बुद्धि के साथ एकरूप हुआ
28:56 पुरुष जब ग्राह्य पदार्थों के स्थूल रूप
28:59 में समाधि की जाती
29:02 है उस समय समाधि में जब तक शब्द अर्थ और
29:08 ज्ञान का विकल्प वर्तमान रहता
29:11 है तब तक तो वह सतर्क समाधि है और जब इनका
29:17 विकल्प नहीं
29:18 रहता तब वही निर् वितर्क कही जाती
29:25 है इसी प्रकार ग्राह्य और ग्रहण के
29:28 सूक्ष्म रूप में समाधि की जाती
29:31 है उस समय समाधि में जब तक शब्द अर्थ और
29:37 ज्ञान का विकल्प रहता
29:39 है तब तक वह स
29:42 विचार और जब इनका विकल्प नहीं रहता तब वही
29:47 निर्विचार कही जाती
29:49 है जब निर्विचार समाधि में विचार का संबंध
29:54 तो नहीं
29:55 रहता परंतु आनंद का अनुभव और अहंकार का
29:59 संबंध रहता
30:01 है तब तक वह आनंदा उगता समाधि
30:06 है और जब उसमें आनंद की प्रतीति भी लुप्त
30:10 हो जाती
30:11 है तब वही केवल अस्मिता अनुग समझी जाती
30:17 है यही निर्विचार समाधि की निर्मलता
30:21 है इनका विस्तृत विचार इसी पाद के 41 व
30:27 सूत्र से 49 वें तक किया गया
30:32 है अब उस अंतिम योग का स्वरूप बतलाते हैं
30:36 जिसके सिद्ध होने
30:39 पर दृष्टा की अपने स्वरूप में स्थिति हो
30:42 जाती
30:44 है जो कि इस शास्त्र का मुख्य प्रतिपाद्य
30:48 है जिसे कैवल अवस्था भी कहते
30:53 हैं विराम
30:57 संस्कार
31:01 शेषन विराम प्रत्यय का अभ्यास जिसकी पूर्व
31:05 अवस्था
31:06 है और जिसमें चित्त का स्वरूप संस्कार
31:11 मात्र ही शेष रहता
31:14 है वह योग अन्य
31:19 है साधक को जब पर वैराग्य की प्राप्ति हो
31:23 जाती
31:24 है उस समय स्वभाव से ही चित्त संसार के
31:29 पदार्थों की ओर नहीं
31:31 जाता वह उनसे अपने आप उपत हो जाता
31:37 है उस उपत अवस्था की प्रतीति का नाम ही
31:41 यहां विराम प्रत्यय
31:45 है इस उप्रति की प्रतीति का अभ्यास क्रम
31:50 भी जब बंद हो जाता
31:52 है उस समय चित्त की वृत्तियों का सर्वथा अ
31:57 भाव हो जाता
32:00 है केवल मात्र अंतिम उपत अवस्था के
32:05 संस्कारों से युक्त चित्त रहता
32:08 है फिर निरोध संस्कारों के क्रम की
32:11 समाप्ति होने से वह चित्त भी अपने करण में
32:16 लीन हो जाता
32:18 है अतः प्रकृति के संयोग का अभाव हो जाने
32:23 पर दृष्टा की अपने स्वरूप में स्थिति हो
32:27 जाती
32:29 है इसी को असप ज्ञात योग निर्ब
32:34 समाधि और कैवल अवस्था आदि नामों से कहा
32:38 गया
32:41 है यहां तक योग और उसके साधनों का संक्षेप
32:45 में वर्णन किया
32:48 गया अब किस प्रकार के साधन का उपर्युक्त
32:52 योग शीघ्र से शीघ्र सिद्ध होता है यह समझा
32:57 के लिए प्रकरण आरंभ किया जाता
33:03 है भव प्रत्यय विधेय प्रकृति लया
33:08 नाम विधेय और प्रकृति
33:11 लय योगियों का उपर्युक्त
33:15 योग भव प्रत्यय कहलाता
33:19 है जो पूर्व जन्म में योग का साधन
33:23 करते-करते
33:25 वि अवस्था तक पहुंच चुके
33:29 थे अर्थात शरीर के बंधन से छूटकर शरीर के
33:34 बाहर स्थिर हो जाने का जिनका अभ्यास दृढ़
33:38 हो चुका
33:40 था जो महा विदेह स्थिति को प्राप्त कर
33:43 चुके
33:44 थे एवं जो साधन करते-करते
33:48 प्रकृति लय तक की स्थिति प्राप्त कर चुके
33:52 थे किंतु कैवल्य पद की प्राप्ति होने के
33:56 पहले जिन जिन की मृत्यु हो
33:58 गई उन दोनों प्रकार के योगियों का जब
34:02 पुनर्जन्म होता
34:03 है जब वे योग भ्रष्ट साधक पुनः योगी कुल
34:08 में जन्म ग्रहण करते
34:11 हैं तब उनको पूर्व जन्म के योगाभ्यास
34:15 विषयक संस्कारों के प्रभाव
34:18 से अपनी स्थिति का तत्काल ज्ञान हो जाता
34:23 है और वे साधन की परंपरा के बिना ही
34:27 निर्ब समाधि अवस्था को प्राप्त कर लेते
34:31 हैं उनकी निर्ब समाधि उपाय जन्य नहीं
34:37 है अतः उसका नाम भव प्रत्यय
34:43 है अर्थात वह ऐसी समाधि है कि जिसके सिद्ध
34:48 होने में पुनः मनुष्य जन्म प्राप्त होना
34:51 ही कारण
34:52 है साधन समुदाय
34:55 नहीं दूसरे साधकों का योग कैसे सिद्ध होता
34:59 है सो बतलाते
35:03 हैं श्रद्धा वीर्य स्मृति समाधि प्रज्ञा
35:07 पूर्वक इतरे
35:10 शम दूसरे साधकों का निरोध रूप
35:14 योग श्रद्धा वीर्य स्मृति
35:19 समाधि और प्रज्ञा पूर्वक क्रम से सिद्ध
35:23 होता
35:25 है
35:27 किसी भी साधन में प्रवृत होने का और अविचल
35:31 भाव से उसमें लगे रहने का मूल कारण
35:34 श्रद्धा यानी भक्ति पूर्वक विश्वास ही
35:39 है श्रद्धा की कमी के कारण ही साधक के
35:43 साधन की उन्नति में विलंब होता
35:47 है अन्यथा कल्याण के साधन में विलंब का
35:50 कोई कारण नहीं
35:53 है साधन के लिए किसी अपत योग्यता और
35:57 परिस्थिति की आवश्यकता नहीं
36:00 है इसीलिए सूत्र का ने श्रद्धा को पहला
36:04 स्थान दिया
36:06 है श्रद्धा के साथ साधक में वीर्य अर्थात
36:12 मन इंद्रिय और शरीर का सामर्थ्य भी परम
36:16 आवश्यक
36:18 है क्योंकि इसी से साधक का उत्साह बढ़ता
36:22 है श्रद्धा और वीर्य इन दोनों का योग
36:27 मिलने पर साधक की स्मरण शक्ति बलवती हो
36:30 जाती
36:32 है तथा उसमें योग साधन के संस्कारों का ही
36:36 बारंबार प्राकट्य होता रहता
36:39 [संगीत]
36:40 है अतः उसका मन विषयों से विरक्त होकर
36:45 समाहित हो जाता
36:47 है इसी को समाधि कहते
36:53 हैं इससे अंतःकरण स्वच्छ हो हो जाने पर
36:58 साधक की बुद्धि रितम भरा यानी सत्य को
37:03 धारण करने वाली हो जाती
37:07 है इस बुद्धि का नाम ही समाधि प्रज्ञा
37:14 है अत पर वैराग्य की प्राप्ति पूर्वक साधक
37:19 का निर्ब समाधि रूप योग सिद्ध हो जाता
37:25 है गीता के अध्याय चार में भी कहा गया
37:29 है जितेंद्रिय साधन परायण और श्रद्धावन
37:33 मनुष्य ज्ञान को प्राप्त
37:37 होकर वह बिना विलंब के तत्काल ही परम
37:41 शांति को प्राप्त हो जाता
37:44 है अब अभ्यास वैराग्य की अधिकता के कारण
37:49 योग की सिद्धि शीघ्र और अति शीघ्र होने की
37:52 बात कहते
37:55 हैं तीव्र संवेगात्मक
38:26 उनका योग शीघ्र सिद्ध होता
38:30 है
38:33 किंतु मृदु मध्या मातृ त्वा ततो प
38:39 विशेष साधन की मात्रा हल्की मध्यम और उच्च
38:43 होने के
38:45 कारण तीव्र संवेग वालों में भी काल का भेद
38:49 हो जाता
38:50 है
38:53 व्याख्या किसका साधन किस दर्जे का का है
38:57 इस पर भी योग सिद्धि की शीघ्रता का विभाग
39:00 निर्भर करता
39:02 है क्योंकि क्रियात्मक अभ्यास और वैराग्य
39:06 तीव्र होने पर
39:08 भी विवेक और भाव की न्यूता के
39:13 कारण समाधि सिद्ध होने के काल में भेद
39:17 होना स्वाभाविक
39:20 है जिस साधक में श्रद्धा विवेक शक्ति और
39:25 भाव कुछ उन्नत
39:28 है उसका साधन मध्य मात्रा वाला
39:33 है और जिस साधक में श्रद्धा विवेक और भाव
39:38 अत्यंत उन्नत है उसका साधन अधिक मात्रा
39:42 वाला
39:45 है साधन में क्रिया की अपेक्षा भाव का
39:49 अधिक महत्व
39:51 है अभ्यास और वैराग्य का जो क्रियात्मक
39:55 बय स्वरूप
39:57 है वह तो ऊपर वाले सूत्र में वेग के नाम
40:01 से कहा गया
40:04 है और उनका जो भावात्मक अभ्यांतर स्वरूप
40:09 है वह उनकी मात्रा यानी दर्जा
40:16 है व्यवहार में भी देखा जाता है कि एक ही
40:19 काम के लिए समान रूप से परिश्रम किया जाने
40:22 पर
40:24 भी जो उसकी सिद्धि में अधिक विश्वास रखता
40:27 है जिस मनुष्य को उस काम के करने की
40:30 युक्ति का अधिक ज्ञान
40:32 है एवं जो उसे प्रेम और उत्साह पूर्वक
40:37 बिना उगता करता
40:39 है वह दूसरों की अपेक्षा उसे जल्दी पूरा
40:43 कर लेता
40:45 है वही बात समाधि की सिद्धि में भी समझ
40:48 लेनी
40:51 चाहिए समाधि की प्राप्ति के लिए साधन करने
40:55 वालों में
40:56 जिसका साधन श्रद्धा विवेक
41:00 शक्ति और भावा आदि की अधिकता के कारण
41:04 जितने ऊंचे दर्जे का
41:06 है और जिसकी चाल का क्रम जितना तेज
41:11 है उसी के अनुसार वह शीघ्र या अति शीघ्र
41:16 समाधि की प्राप्ति कर
41:21 लेगा यही बात समझाने के लिए सूत्र का ने
41:25 उपर्युक्त दो सूत्रों की रचना की
41:29 है अतः साधक को चाहिए कि अपने साधन को
41:34 सर्वथा निर्दोष बनाने की चेष्टा
41:37 रखे उसमें किसी प्रकार की शिथिलता ना आने
41:43 दे अब पूर्त अभ्यास और वैराग्य की अपेक्षा
41:48 निर्ज समाधि का सुगम उपाय बतलाया जाता
41:52 है ईश्वर प्राणि धाना दवा
41:57 इसके सिवा ईश्वर प्राणि धान से
42:01 भी निर्ब समाधि की सिद्धि शीघ्र हो सकती
42:07 है
42:08 व्याख्या ईश्वर की भक्ति यानी शरणागति का
42:13 नाम ईश्वर प्राणि धान
42:16 है इससे भी निर्ब समाधि शीघ्र सिद्ध हो
42:21 सकती
42:22 है क्योंकि ईश्वर सर्व समर्थ है
42:27 वे अपने
42:30 शरणापुर
42:38 के लक्षण बतलाते
42:41 हैं क्लेश कर्म विपा का शायर पराम पुरुष
42:46 विशेष
42:50 ईश्वर क्लेश कर्म विपाक और आशय
42:57 इन चारों से जो संबंधित नहीं है तथा जो
43:02 समस्त पुरुषों से उत्तम
43:04 है वह ईश्वर
43:07 है अविद्या अस्मिता राग द्वेष और
43:15 अभिनिवेश यह पांच क्लेश
43:19 हैं इसका विस्तृत वर्णन दूसरे पाद के
43:23 तीसरे सूत्र से नवे तक है
43:27 कर्म चार प्रकार के
43:29 हैं
43:31 पुण्य
43:33 पाप पुण्य और पाप
43:36 मिश्रित तथा पुण्य पाप से
43:39 रहित कर्म के फल का नाम विपाक
43:44 है और कर्म संस्कारों के समुदाय का नाम
43:48 आशय
43:50 है समस्त जीवों का इन चारों से अनादि
43:55 संबंध है
43:58 यद्यपि मुक्त जीवों का पीछे संबंध नहीं
44:01 रहता तो भी पहले संबंध था
44:04 ही किंतु ईश्वर का तो कभी भी इनसे ना
44:07 संबंध था ना है और ना होने वाला
44:12 है इस कारण उन मुक्त पुरुषों से भी ईश्वर
44:16 विशेष
44:18 है यह बात प्रकट करने के लिए ही सूत्र ने
44:23 पुरुष विशेष पद का प्रयोग किया है
44:27 ईश्वर की विशेषता का पुनः प्रतिपादन करते
44:31 हैं तत्र निरत शयम सर्वज्ञ
44:36 बीजम उस ईश्वर में सर्वज्ञ का बीज कारण
44:43 अर्थात ज्ञान निरत शय
44:47 है जिससे बढ़कर कोई दूसरी वस्तु हो वह
44:51 साति शय है और जिससे बड़ा कोई ना हो
44:56 वह निरत शय
44:58 है जिससे बढ़कर कोई दूसरी वस्तु हो वह
45:03 साति शय
45:05 है और जिससे बड़ा कोई ना हो वह निरत शय
45:12 है ईश्वर ज्ञान की अवधि है उसका ज्ञान
45:17 सबसे बढ़कर है उसके ज्ञान से बढ़कर किसी
45:20 का भी ज्ञान नहीं
45:22 है इसलिए उसे निरत शय कहा गया
45:28 जिस प्रकार ईश्वर में ज्ञान की पराकाष्ठा
45:31 है उसी प्रकार धर्म वैराग्य यश और ऐश्वर्य
45:37 आदि की पराकाष्ठा का आधार भी उसी को समझना
45:43 चाहिए और भी उसकी विशेषता का प्रतिपादन
45:46 करते
45:47 हैं पूर्वे श्याम प गुरु काले नान व छे
45:52 दात वह ईश्वर सबके पूर्वजों का भी गुरु
45:57 है क्योंकि उसका काल से अव छेद नहीं
46:02 है व्याख्या सर्ग के आदि में उत्पन्न होने
46:07 के कारण सबका गुरु ब्रह्मा को माना जाता
46:10 है परंतु उसका काल से अव छेद है ईश्वर
46:15 स्वयं अनादि और अन्य सब का आदि
46:19 है वह काल की सीमा से सर्वथा अतीत है वहां
46:24 तक काल की पहुंच नहीं है क्योंकि वह काल
46:28 का भी महाकाल
46:30 है इसलिए वह संपूर्ण पूर्वजों का भी गुरु
46:34 यानी सबसे बड़ा
46:36 है सबसे पुराना और सबको शिक्षा देने वाला
46:42 है ईश्वर की शरणागति का प्रकार बतला के
46:45 लिए उसके नाम का वर्णन करते
46:49 हैं तस्य वाचक
46:53 प्रणव उस ईश्वर का वाचक नाम प्रणव ओमकार
47:00 है नाम और नामी का संबंध अनादि और बड़ा ही
47:04 घनिष्ट है इसी कारण शास्त्रों में नाम जप
47:08 की बड़ी महिमा
47:10 है गीता में भी जप यज्ञ को सब यज्ञों में
47:14 श्रेष्ठ बतलाया गया
47:16 है
47:18 ओम उस परमेश्वर का वेदोक्त नाम होने से
47:21 मुख्य
47:23 है इस कारण यहां उसी का वण न किया गया
47:27 है इसी वर्णन से श्री राम श्री कृष्ण आदि
47:32 जितने भी ईश्वर के नाम है उनके जप का भी
47:36 महात्म समझ लेना
47:39 चाहिए ईश्वर का नाम बतला करर अब उसके
47:43 प्रयोग की विधि बताते
47:46 हैं उस ओमकार का जप और उसके अर्थ स्वरूप
47:51 परमेश्वर का चिंतन करना
47:54 चाहिए साधक को ईश्वर के नाम का जप और उसके
47:58 स्वरूप का स्मरण चिंतन करना
48:02 चाहिए इसी को पूर्वोदय प्राणि धान अर्थात
48:07 ईश्वर की भक्ति या शरणागति कहते
48:12 हैं ईश्वर की भक्ति के और भी बहुत से
48:15 प्रकार
48:16 हैं परंतु जप और ध्यान सब साधनों में
48:20 मुख्य होने के कारण यहां सूत्र का ने केवल
48:24 नाम और नामी के स्म रूप एक ही प्रकार का
48:27 वर्णन किया
48:29 है गीता में भी इसी तरह वर्णन आया
48:32 है इसे उपलक्ष मानकर भगवत भक्ति के सभी
48:37 साधनों को ईश्वर की प्रसन्नता के नाते
48:41 निर्ज समाधि की सिद्धि में हेतु समझना
48:45 चाहिए अर्थात ईश्वर की भक्ति के सभी अंग
48:49 प्रत्यंग का ईश्वर प्राणि धान में अंत भाव
48:53 समझना चाहिए i