नमस्कार साथियों, कैसे हैं आप सब? दिखाई
यह पड़ रहा है कि इन दिनों माननीय की कोई
मान नहीं रहा। मैं बात कर रहा हूं ऑनरेबल
सुप्रीम कोर्ट के बारे में। आप देख रहे
होंगे कि सत्ता पक्ष और सुप्रीम कोर्ट के
बीच ही आज की डेट में जंग छिड़ गई है। कुछ
समय पहले तक कुछ समुदाय विशेष के लोग
सुप्रीम कोर्ट के बारे में कह रहे थे कि
हम उनकी नहीं मानते। अब तो सत्ता पक्ष ही
सुप्रीम कोर्ट से लड़ने लग गया है। जिसे
देखो वही सुप्रीम कोर्ट का कंटेंप्ट यानी
अवमानना कर रहा है। कारण कौन है? कौन
जिम्मेदार है? मुझे लगता है इसके लिए
स्वयं सुप्रीम कोर्ट जिम्मेदार है। आपको
एक केस याद होगा प्रशांत भूषण वाला।
प्रशांत भूषण वाले मामले में सुप्रीम
कोर्ट ने प्रशांत भूषण जो कि सुप्रीम
कोर्ट के एक वरिष्ठ एडवोकेट हैं उनके
खिलाफ अवमानना का मामला चलाया। आफ्टर ड्यू
हियरिंग पूरी सुनवाई करने के बाद एक का
जुर्माना लगाया और प्रशांत भूषण इस
जुर्माने में शर्मिंदा महसूस करने की जगह
वो एक के साथ फोटो खिंचवाते हुए पोस्ट लिख
रहे थे और वीडियो बना रहे थे। मुझे लगता
है कि सुप्रीम कोर्ट को या तो उस मामले
में माफ कर देना चाहिए था प्रशांत भूषण को
या सुनवाई के बाद ठीक सजा देनी चाहिए थी
ताकि और लोग सुप्रीम कोर्ट की अवमानना
करने से बचते। बहरहाल मैं आज बात करने
वाला हूं उपराष्ट्रपति जगदीप धनकड़ साहब
के एक बयान के बारे में। उन्होंने कहा कि
संविधान का आर्टिकल 142 एक परमाणु मिसाइल
बन गया है जिसका उपयोग सुप्रीम कोर्ट कर
रहा है। यह आर्टिकल 142 क्या है? जगदीप
धनखड़ साहब ने ऐसा क्यों कहा? सुप्रीम
कोर्ट ने 142 का उपयोग कब कब किया है। आज
इस बारे में बहुत डिटेल में मैं आपको
समझाने वाला हूं। जुड़े रहना है लास्ट तक
इस लेक्चर से ताकि कानून की बारीकियों को
आप आसान शब्दों में समझ पाए और यह भी समझ
पाए कि देश में चल क्या रहा है। आइए शुरू
करते हैं। दरअसल सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही
में आर्टिकल 142 का इस्तेमाल करके
तमिलनाडु के राज्यपाल को विधेयक रोकने पर
फटकार लगाई थी और राष्ट्रपति को भी
निर्देश दे दिए थे। प्रश्न यह उठता है कि
क्या सुप्रीम कोर्ट किसी मामले में
राष्ट्रपति को निर्देश दे सकता है या पहले
कभी दिया है? तो हुआ यह कि तमिलनाडु
विधानसभा में 2020 से 2023 के बीच 12
विधेयक पारित हुए। इन्हें मंजूरी के लिए
राज्यपाल आर एन रवि के पास भेजा गया।
उन्होंने विधेयकों पर कोई कार्यवाही नहीं
की और उन्हें अपने पास दबाकर रख लिया। तो
राज्यपाल और राष्ट्रपति को विधेयकों के
संबंध में पॉकेट वीटो यानी जेबी वीटो का
अधिकार है। इसके तहत वह करते क्या है कि
जिस कानून को मंजूरी नहीं देनी है उसे
अपने पास रख लेते हैं और उस कानून को फिर
मान्यता मिलती ही नहीं है। वो कानून बंद
बस्ते में रख दिया जाता है। ऐसा कह सकते
हैं। अक्टूबर 2023 में तमिलनाडु सरकार ने
सुप्रीम कोर्ट से गुहार लगाई। इसके बाद
राज्यपाल ने 10 विधेयक बिना साइन किए लौटा
दिए और दो विधेयकों को राष्ट्रपति के पास
विचार के लिए भेज दिया। सरकार ने 10
विधेयक दोबारा पारित कर राज्यपाल के पास
भेज दिए। राज्यपाल ने इस बार उन्हें
राष्ट्रपति के पास भेज दिया। सुप्रीम
कोर्ट ने 8 अप्रैल 2025 को एक सुनवाई करते
हुए राज्यपाल के इस तरह विधेयक अटकाने को
अवैध और गैर संवैधानिक बताया। जस्टिस जेबी
पारदीवाला की बेंच ने गवर्नर से कहा कि आप
कॉन्स्टिट्यूशन के हिसाब से चलें।
पार्टियों की मनमर्जी नहीं चलेगी।
राज्यपाल ने ईमानदारी से काम नहीं किया।
ऐसा सुप्रीम कोर्ट का कहना है। इसलिए
कोर्ट ने आदेश दिया कि इन 10 विधेयकों को
पारित माना जाए। यानी कि अब यह कानून बन
गए हैं। ऐसा मान लिया जाए। आपको बता दूं
कि देश में ऐसा पहली बार हुआ है कि
राज्यपाल के बिना सहमति के कानून लागू हो
गए हैं। दरअसल हमारे कॉन्स्टिट्यूशन में
यह निर्धारित किया ही नहीं गया है कि
विधानसभा से पारित विधेयक को राज्यपाल या
राष्ट्रपति कितने दिनों के लिए रोक सकते
हैं या कितने दिनों के भीतर उन्हें मंजूरी
देनी है। संविधान में सिर्फ इतना लिखा है
कि उन्हें जितनी जल्दी हो सके एस सून एस
पॉसिबल फैसला लेना होगा। सुप्रीम कोर्ट ने
यह जितनी जल्दी हो सके इसकी व्याख्या कर
दी है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अगर राज्य
सरकार कोई विधेयक मंजूरी के लिए भेजती है
तो राज्यपाल को एक महीने के भीतर
कार्यवाही करनी होगी। अगर राज्यपाल इस
विधेयक को राष्ट्रपति के पास भेजते हैं तो
राष्ट्रपति के पास भी इस पर फैसला लेने के
लिए 3 महीने का समय होगा। इससे ज्यादा दिन
तक अगर वह विधेयक को लौटाते हैं तो उन्हें
उचित कारण बताना होगा। अगर राज्यपाल या
राष्ट्रपति समय सीमा के भीतर कोई
कार्यवाही नहीं करते हैं तो सरकारें जो है
वह कोर्ट तक जा सकती हैं, अदालत जा सकती
हैं। अब आते हैं उपराष्ट्रपति जगदीप धनकड़
साहब के बयान पर कि क्यों उन्होंने कहा कि
आर्टिकल 142 एक परमाणु मिसाइल बन गया है
और ऐसी टिप्पणी क्यों की कि जो हमारे देश
का सुप्रीम कोर्ट है वो राष्ट्रपति को
निर्देश नहीं दे सकते। उनके कार्यों पर
टिप्पणी नहीं कर सकते। ऐसा क्यों कहा? तो
17th अप्रैल को उपराष्ट्रपति जगदीप धनकर
ने एक भाषण देते हुए कहा कि अदालतें
राष्ट्रपति को आदेश कैसे दे सकती हैं?
उन्होंने कहा कि संविधान का आर्टिकल 142
यह कोर्ट को मिला एक विशेष अधिकार है।
लेकिन इसका उपयोग लोकतंत्र के खिलाफ जो
शक्तियां हैं उनके लिए कारगर साबित हो गया
है। और लोकतांत्रिक शक्तियां जो हैं उनके
खिलाफ इसका उपयोग किया जा रहा है।
न्यूक्लियर मिसाइल की तरह जज सुपर
पार्लियामेंट की तरह काम कर रहे हैं। ऐसा
उन्होंने कहा। तो अब बता दूं कि आर्टिकल
142 क्या है? और कॉन्स्टिटुएंट असेंबली
में जब 142 पर चर्चा हो रही थी तो बाबा
साहब आंबेडकर ने इस आर्टिकल के बारे में
क्या कहा था? तो आपको बता दूं कि जब हमारा
संविधान बन रहा था तो संविधान निर्माताओं
ने संविधान में वो सब बातें शामिल की थी
जो बहुत महत्वपूर्ण थी और जो उस समय सोची
जा सकती थी। इसके साथ ही आर्टिकल 142
शामिल किया गया था जिसके जरिए सुप्रीम
कोर्ट को पूर्ण न्याय यानी कंप्लीट जस्टिस
करने की विशेष शक्ति दी गई थी ताकि जब
कानून के मौजूदा प्रावधान पर्याप्त ना हो
या स्पष्ट हो तब भी न्याय सुनिश्चित किया
जा सके। जब इस आर्टिकल को संविधान में
साबित करने की बात हुई तो लंबी बहस चली और
अंबेडकर साहब ने कंक्लूडिंग रिमार्क में
कहा देयर मे बी मेनी मैटर्स वेयर दी
ऑर्डिनरी लॉ मे नॉट बी एबल टू गिव अ
रेमेडी। आर्टिकल 142 इज अ सेफ्टी वाल्व।
मतलब यह कि अगर कोई मामला इतना साधारण हो
कि मौजूदा कानून के जरिए न्याय ना किया जा
सके तो आर्टिकल 142 सुप्रीम कोर्ट के लिए
सेफ्टी वाल्व का काम करेगा। तो आपको बता
दूं कि 1950 से 2023 तक सुप्रीम कोर्ट ने
लगभग 1500 से ज्यादा मामलों में एग्जैक्ट
फिगर है 1579 मामलों में आर्टिकल 142 का
उपयोग किया और फैसले सुनाए। इसमें कुछ
मामले तो बहुत चर्चित हैं। कुछ महत्वपूर्ण
मामलों का मैं उल्लेख कर दूं जो सामने
आपकी स्क्रीन पर आ रहे हैं। सबसे चर्चित
अयोध्या राम मंदिर बाबरी मस्जिद वाला
मामला। कोर्ट ने राम मंदिर के पक्ष में
फैसला दिया और मस्जिद के लिए अयोध्या में
ही पांच एकड़ जमीन देने का आदेश दिया और
इसका उपयोग 142 आर्टिकल के तहत किया गया।
फिर है 2012 का सहारा और सेबीके। सुप्रीम
कोर्ट ने सहारा ग्रुप के निवेशकों को पैसा
लौटाने का आदेश दिया और इसके लिए विशेष
मैकेनिज्म भी तैयार किया जिसे कानून में
स्पष्ट रूप से परिभाषित किया ही नहीं गया
था। फिर 2023 का शिवसेना महाराष्ट्र सरकार
विवाद कोर्ट ने माना कि तत्कालीन डेपुटी
स्पीकर ने गलत कदम उठाए लेकिन बागी
विधायकों की सदस्यता को बहाल रखने या
निरस्त करने से इंकार कर दिया। आर्टिकल
142 की संभावित सीमाएं दिखाई पड़ी। फिर एक
केस था 2023 का दिल्ली वर्सेस एलजी का
मामला। सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि दिल्ली
सरकार को अफसरों पर अधिकार है और आर्टिकल
142 का इस्तेमाल करके ट्रांसफर पोस्टिंग
से जुड़े दिशा निर्देश जारी किए थे। फिर
2016 में हाईवे के किनारे शराब बिक्री पर
रोक लगाने का मामला। सुप्रीम कोर्ट ने
नेशनल हाईवे के 500 मीटर के भीतर शराब
बिक्री पर पाबंदी लगा दी थी और ऐसा करने
के लिए सर्वोच्च न्यायालय ने आर्टिकल 142
का उपयोग किया था। तो आर्टिकल 142 सुप्रीम
कोर्ट को सुप्रीम पावर देता है जस्टिस
करने के लिए और कंप्लीट जस्टिस करने के
लिए। मुझे उम्मीद है कि इस आर्टिकल के
बारे में थोड़ी बहुत जानकारी आप तक पहुंची
होगी। लेकिन जो कुछ भी सरकार की तरफ से
सर्वोच्च न्यायालय पर हमला किया जा रहा
है। चाहे वो निशिकांत दुबे ने जो कुछ कहा
या जगदीप धनखड़ जी ने जो कुछ कहा क्या यह
ठीक है? देश में सर्वोच्च कौन है? संसद
है, राष्ट्रपति है, संविधान है या
न्यायपालिका है? एक लेक्चर बहुत डिटेल में
लेकर आऊंगा जिस पर हम कानून के दायरे में
इसके बारे में बात करेंगे। मुझे लगता है
कि सर्वोच्च न्यायालय पर इस तरह से हमला
और बयानबाजी करके सुप्रीम कोर्ट को कमजोर
करने का काम किसी को नहीं करना चाहिए।
किसी एक संस्था पर हमारा विश्वास ही हमें
न्याय तक ले जाएगा। अगर हम किसी भी संस्था
पर विश्वास नहीं करेंगे तो फिर सड़कों पर
न्याय होने लगेगा। क्या हम हमारी
डेमोक्रेसी में ऐसा चाहते हैं कि 2025 में
हम बयानबाजी करके या सड़कों पर न्याय करें
या जो संस्थाएं ठीक काम नहीं कर रही हैं
ऐसा लगता है उन्हें ठीक करने के लिए कानून
बनाएं। मुझे लगता है सभी पक्षों को
बयानबाजी से बचना चाहिए। एक दूसरे का
सम्मान करना चाहिए और जनता की भलाई के लिए
नियम और कानून लेकर आना चाहिए। आपको क्या
लगता है? जरूर कमेंट बॉक्स में जुड़कर
बताइए और अगले लेक्चर में मैं बात करूंगा
देश में सर्वोच्च कौन है? जुड़े रहना है
आपको अपने फेवरेट प्लेटफार्म विधिक शिक्षा
से। नमस्कार जय हिंद
[संगीत]